ब्लॉग प्रबन्ध मण्डली :-

प्रधान सम्पादक- करण समस्तीपुरी, सम्पादक- जन्मेजय, सँयोजक- कुन्दन कुमार मल्लिक,
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Tuesday, 9 June 2009

मन का पंछी उड़ना चाहे….


मन का पंछी उड़ना चाहे,
लेकिन उड़ ना पाये !
हाय !
किसको दर्द सुनाये !!
कतरे गए पंख कोमल और
आँखे हैं धुंधलाई !
धुंधली आंखो में सतरंगी,
सपने बहुत छुपाये !!
हाय !
किसको दर्द सुनाये !!
कहाँ बसेरा, कहाँ ठिकाना,
किस पथ से किस नभ को जाना !!
काल जाल लेकर बैठा है,
भय से जी घबराए !
हाय !
किसको दर्द सुनाये !!

- करण समस्तीपुरी

Wednesday, 6 May 2009

कब आयेगी बेला मिलन की …..

परम प्रिय परमात्मा से विलग जीव, जग-जंजाल में उलझा तो रहता है, किन्तु प्रियतम से मिलन के लिए आत्मा की आकुलता कभी कम नहीं होती! इसी भाव को संजोये प्रस्तुत है, एक सूफी गीत! आपकी प्रतिक्रया ही हमारी रचनात्मक ऊर्जा का इंधन है, इतना ध्यान अवश्य रखेंगे! - करण समस्तीपुरी

*
कब आयेगी बेला मिलन की,
बीती जाए उमरिया !
साज सजा के बैठूं महल बिच,
पर नही चैन बावरिया !
पग बरबस खींचे पनघट पर,
पथ पर लागी नजरिया !
बीती जाए उमरिया !!१!!


आए-गए बहार-बसंती,
पर नही लीन्ही खबरिया !
अब तो आन मिलो मेरे प्रियतम,
घिर आयी है बदरिया !!
बीती जाए उमरिया !!२!!


अँखियाँ बनी है सावन भादों,
पर उर में है ज्वाला !
विरह की आग लगी तन-मन में,
आओ बुझाओ सांवरिया !
बीती जाए उमरिया !!३!!

*

Tuesday, 28 April 2009

जीवन पथ पर ..

मैं जीवन पथ पर चल चल कर,
क्यूँ बार-बार रुक जता हूँ !
है कोई शक्ति अदृश्य कि मैं,
उसके आगे झुक जाता हूँ !!
मैं जीवन पथ पर .. !!१!!

क्या इस पथ का उद्देश्य भला ?
मैं क्यूँ इस पथ पर आन चला ??
आगे का पथ है ज्ञात नही !
कोई पथ-प्रदर्शक साथ नही !!
मैं चरण चिन्ह किनके चूमूं,
हर मोर पे आ चुक जाता हूँ !!
मैं जीवन पथ पर ... !!२!!

न सखा कोई न है सहचर !
है लक्ष्य दूर, अज्ञात डगर !!
एक ओर भीड़ एक निर्जन है !
किस पथ से जाऊं, उलझन है !!
हर ओर कदम दो-एक चल कर,
किस भय से मैं घबराता हूँ !
मैं जीवन पथ पर ... !!३!!

पर लेता हूँ मैं आज शपथ !
चाहे जितना लंबा हो पथ !!
कंटक-संकट से भीत नही !
मैं थक बैठूं, यह रीत नही !!
ये आश-निराश का धूप -छाँव,
विश्वास से मैं ठुकराता हूँ !
मैं जीवन पथ पर चल-चल कर,
क्यूँ बार-बार रुक जाता हूँ !!४!!

Wednesday, 22 April 2009

गहन तिमिर है ...

- करण समस्तीपुरी


गहन तिमिर है, पंख पसारे !

गहन नीरवता, हृदय हमारे !!

आस क्षीण है, करूण वेदना !

तरुण हृदय, दृग में जलधारे !!

गहन तिमिर है... !!


धरती पर हैं, गीत अमा के !

तारों की बारात, गगन में !

हृदय विवश, व्याकुल है अंतस,

कठिन द्वंद है, अंतर्मन में !

आँखें थकी, आस कुम्हलाये,

प्रभा किरण की, पंथ निहारे !

गहन तिमिर है ... !!


अकथ व्यथा से, कम्पित अलकें,

पीड़ा से हैं, भींगी पलकें !

पर विश्वास, नयन में झलकें !

आयेंगे ! निश्चय आयेंगे !!

चिर प्रतीक्षित, दिन उजियारे !!

गहन तिमिर है ... !!

Friday, 17 April 2009

किसे सुनाऊँ अपने गीत- करण समस्तीपुरी

प्रस्तुत है "कर्ण कायस्थ चिठ्ठी" के प्रधान सम्पादक "युनि कवि" श्री करण समस्तीपुरी की एक पुरस्कृत रचना।



तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत!!
वह मधुमय संसार सुहाना,
वह स्वर्णिम शैशव का हास!
सह-क्रीड़ा, साहचर्य हमारा,
बन कर रहा शुष्क इतिहास!!
क्या ये आँख मिचौनी ही है,
जरा बता बचपन के मीत!
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत !!

कोतूहल कलरव पीपल तल,
बृहद् विटप की शीतल छाँव!
तटिनी तट फैला सिकतांचल,
स्नेह-सुधानिधि सुंदर गांव!
पगडण्डी पर आँख बिछाए,
गए कई निशि-वाषर बीत!
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत !!

अश्रु शेष केवल आंखों में,
सपने तक नहीं आते हैं!
उस पीड़ा को क्या जानो तुम,
जब अपने छोड़ के जाते हैं!
याद तुम्हीं को करना प्रतिपल,
मेरे जर-जीवन की रीत!
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत!!
 

कर्ण कायस्थ चिठ्ठी