परम प्रिय परमात्मा से विलग जीव, जग-जंजाल में उलझा तो रहता है, किन्तु प्रियतम से मिलन के लिए आत्मा की आकुलता कभी कम नहीं होती! इसी भाव को संजोये प्रस्तुत है, एक सूफी गीत! आपकी प्रतिक्रया ही हमारी रचनात्मक ऊर्जा का इंधन है, इतना ध्यान अवश्य रखेंगे! - करण समस्तीपुरी
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कब आयेगी बेला मिलन की,
बीती जाए उमरिया !
साज सजा के बैठूं महल बिच,
पर नही चैन बावरिया !
पग बरबस खींचे पनघट पर,
पथ पर लागी नजरिया !
बीती जाए उमरिया !!१!!
आए-गए बहार-बसंती,
पर नही लीन्ही खबरिया !
अब तो आन मिलो मेरे प्रियतम,
घिर आयी है बदरिया !!
बीती जाए उमरिया !!२!!
अँखियाँ बनी है सावन भादों,
पर उर में है ज्वाला !
विरह की आग लगी तन-मन में,
आओ बुझाओ सांवरिया !
बीती जाए उमरिया !!३!!
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मैं जीवन पथ पर चल चल कर,
क्यूँ बार-बार रुक जता हूँ !
है कोई शक्ति अदृश्य कि मैं,
उसके आगे झुक जाता हूँ !!
मैं जीवन पथ पर .. !!१!!
क्या इस पथ का उद्देश्य भला ?
मैं क्यूँ इस पथ पर आन चला ??
आगे का पथ है ज्ञात नही !
कोई पथ-प्रदर्शक साथ नही !!
मैं चरण चिन्ह किनके चूमूं,
हर मोर पे आ चुक जाता हूँ !!
मैं जीवन पथ पर ... !!२!!
न सखा कोई न है सहचर !
है लक्ष्य दूर, अज्ञात डगर !!
एक ओर भीड़ एक निर्जन है !
किस पथ से जाऊं, उलझन है !!
हर ओर कदम दो-एक चल कर,
किस भय से मैं घबराता हूँ !
मैं जीवन पथ पर ... !!३!!
पर लेता हूँ मैं आज शपथ !
चाहे जितना लंबा हो पथ !!
कंटक-संकट से भीत नही !
मैं थक बैठूं, यह रीत नही !!
ये आश-निराश का धूप -छाँव,
विश्वास से मैं ठुकराता हूँ !
मैं जीवन पथ पर चल-चल कर,
क्यूँ बार-बार रुक जाता हूँ !!४!!
- करण समस्तीपुरी
गहन तिमिर है, पंख पसारे !
गहन नीरवता, हृदय हमारे !!
आस क्षीण है, करूण वेदना !
तरुण हृदय, दृग में जलधारे !!
गहन तिमिर है... !!
धरती पर हैं, गीत अमा के !
तारों की बारात, गगन में !
हृदय विवश, व्याकुल है अंतस,
कठिन द्वंद है, अंतर्मन में !
आँखें थकी, आस कुम्हलाये,
प्रभा किरण की, पंथ निहारे !
गहन तिमिर है ... !!
अकथ व्यथा से, कम्पित अलकें,
पीड़ा से हैं, भींगी पलकें !
पर विश्वास, नयन में झलकें !
आयेंगे ! निश्चय आयेंगे !!
चिर प्रतीक्षित, दिन उजियारे !!
गहन तिमिर है ... !!